बसना

सुशासन का ढोल, ज़मीनी हकीकत में खोल — फिर शुरू हुआ छलावे का खेल!

  • बसना :  बीते वर्ष जिस “सुशासन” का ढिंढोरा पीटा गया, वह धरातल पर महज़ एक छलावा साबित हुआ। अब एक बार फिर उसी पुराने ढर्रे पर प्रशासन गांव-गांव “सुशासन शिविर” लगाने की तैयारी में जुटा है, लेकिन सवाल वही है—क्या इस बार सच में जनता को राहत मिलेगी या फिर कागजों में ही समस्याओं का समाधान कर दिया जाएगा?
  • गांव की भोली-भाली जनता, तपती धूप और भीषण गर्मी की परवाह किए बिना, अपनी उम्मीदों का बोझ लेकर इन शिविरों में पहुंचती है। उन्हें विश्वास होता है कि उनकी वर्षों पुरानी समस्याओं का समाधान अब जरूर होगा। लेकिन हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। शिविर खत्म होते ही फाइलों में समाधान दिखा दिया जाता है, ऑनलाइन पोर्टल में “समस्या निराकृत” लिख दिया जाता है, लेकिन जमीन पर हालात जस के तस बने रहते हैं।
  • विगत वर्ष के कई ऐसे प्रकरण सामने आए, जहां आवेदकों ने पूरी प्रक्रिया पूरी की, आवेदन दिया, अधिकारियों से गुहार लगाई—लेकिन समाधान केवल कागजों तक सीमित रह गया। आम आदमी को यह तक पता नहीं चल पाता कि उसकी समस्या “निपट” भी गई है। सिस्टम में टिक लग गया, लेकिन समस्या वहीं की वहीं खड़ी रही, जैसे प्रशासन का मज़ाक उड़ा रही हो।
    बसना विधानसभा के सक्रिय कांग्रेस नेता एवं जिला पंचायत सदस्य मोक्ष कुमार प्रधान ने इस मुद्दे पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि जब समस्याओं का वास्तविक समाधान ही नहीं हो रहा, तो ऐसे सुशासन शिविर महज़ खानापूर्ति बनकर रह जाते हैं। यह जनता के साथ सीधा-सीधा छल है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन सिर्फ आंकड़े सुधारने और रिपोर्ट चमकाने में लगा है, जबकि आम जनता आज भी बुनियादी समस्याओं से जूझ रही है।
  • उन्होंने आगे कहा कि “सुशासन” का मतलब सिर्फ शिविर लगाना नहीं, बल्कि हर व्यक्ति की समस्या का ईमानदारी से समाधान करना है। यदि अधिकारी केवल फाइलों में टिक लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान रहे हैं, तो यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के साथ अन्याय है।
  • आज जरूरत है दिखावे से बाहर निकलकर जमीनी स्तर पर काम करने की। जनता अब जागरूक हो चुकी है और हर झूठे वादे का हिसाब मांगने को तैयार है। अगर इस बार भी वही पुरानी कहानी दोहराई गई, तो यह सुशासन नहीं बल्कि “कुशासन” का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आएगा
  • अब देखना यह है कि प्रशासन इस बार सच में बदलाव लाता है या फिर एक बार फिर “सुशासन” के नाम पर जनता के भरोसे के साथ खेल होता है।
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