रैंप वॉक पर बवाल: सिलाई ट्रेनिंग के बहाने रायपुर ले जाने का पूर्व माओवादी महिलाओं का आरोप
रायपुर फैशन शो में पूर्व माओवादी महिलाओं की रैंप वॉक

रायपुर। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर रायपुर में आयोजित फैशन शो में पूर्व माओवादी महिलाओं की रैंप वॉक अब चर्चा का विषय बन गई है। सरकार जहां इसे पूर्व माओवादी महिलाओं के पुनर्वास, आत्मविश्वास और सशक्तिकरण की मिसाल के तौर पर पेश कर रही है, वहीं रैंप वॉक में शामिल कुछ महिलाओं ने आरोप लगाया है कि उन्हें सिलाई प्रशिक्षण के नाम पर सुकमा से रायपुर ले जाया गया था और वहां पहुंचने के बाद रैंप वॉक की ट्रेनिंग देकर कार्यक्रम में शामिल कराया गया।
द वायर हिंदी न्यूज़ रिपोर्ट्स के अनुसार बीते 7 अगस्त को रायपुर के दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर ग्रामोद्योग विभाग की ओर से कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसमें कोसा सिल्क और पारंपरिक हथकरघा वस्त्रों को बढ़ावा देने के लिए फैशन शो भी रखा गया। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी मौजूद थे।
सुकमा से 10 महिलाएं हुईं शामिल
रैंप वॉक में सुकमा जिले से कुल 10 महिलाओं ने हिस्सा लिया। इनमें 9 महिलाएं ऐसी थीं, जिन्होंने पिछले एक वर्ष के दौरान अलग-अलग समय पर छत्तीसगढ़ और तेलंगाना पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया था। एक महिला पुलिसकर्मी भी इस समूह में शामिल थी।
इन महिलाओं के मुताबिक उन्हें जगदलपुर में सिलाई प्रशिक्षण दिलाने की बात कहकर सुकमा से रायपुर ले जाया गया। 1 अगस्त को रायपुर पहुंचने के बाद उन्हें होटल में ठहराया गया और 2 से 6 अगस्त तक रैंप वॉक की ट्रेनिंग दी गई। महिलाओं का कहना है कि उन्हें पहले रैंप वॉक के बारे में जानकारी तक नहीं थी।

द वायर हिंदी न्यूज़ रिपोर्ट्स के अनुसार एक महिला ने बताया कि उन्हें सिलाई का काम सिखाने की बात कही गई थी, लेकिन वहां सिलाई मशीन की ट्रेनिंग के बजाय चलने और रैंप पर प्रस्तुति देने की ट्रेनिंग शुरू कर दी गई। उनका कहना था कि यदि उन्हें पहले से फैशन शो में शामिल होने की जानकारी होती तो वे शायद वहां नहीं जातीं।
महिलाओं का दावा—‘हमें पहले नहीं बताया गया’
रैंप वॉक में शामिल महिलाओं ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें कार्यक्रम के बारे में पूरी जानकारी नहीं दी गई थी। एक महिला के मुताबिक, मुंबई से आए कुछ लोगों ने उन्हें रैंप वॉक की ट्रेनिंग दी और प्रशिक्षण के दौरान उन्हें डांट-फटकार भी झेलनी पड़ी।
महिलाओं ने यह भी बताया कि कार्यक्रम में शामिल होने के बदले उन्हें कोई पारिश्रमिक नहीं मिला। उनके अनुसार उन्हें केवल एक झोला, एक साड़ी और ट्रैक सूट दिया गया।
विभाग का दावा—सहमति से हुआ कार्यक्रम
वहीं ग्रामोद्योग विभाग के सुकमा प्रभारी सचिव राजेश सिंह राणा ने इन आरोपों से अलग तस्वीर पेश की। उनका कहना है कि महिलाओं की कार्यक्रम में भागीदारी उनकी सहमति से हुई थी। उनके अनुसार जिला कलेक्टर की ओर से सहमति पत्र भी प्राप्त हुए थे।

राणा का कहना है कि पुनर्वास केंद्र में महिलाओं से उनके रोजगार और भविष्य की योजनाओं को लेकर चर्चा की गई थी। बातचीत के दौरान कुछ महिलाओं ने मंच पर आने में रुचि दिखाई, जिसके बाद उन्हें हथकरघा दिवस के कार्यक्रम से जोड़ा गया।
उन्होंने यह भी दावा किया कि रैंप वॉक में शामिल प्रत्येक महिला को 10 हजार रुपये दिए गए, जो उनके बैंक खातों में भेजे जाने थे। हालांकि, महिलाओं ने दावा किया कि उन्हें अभी तक कोई राशि प्राप्त नहीं हुई है।
सहमति पत्र पर भी सवाल
रैंप वॉक के संबंध में कथित सहमति पत्र सामने आने की बात भी सामने आई है। इनमें स्वदेशी फैशन शो/प्रदर्शनी में भाग लेने की इच्छा से संबंधित नाम, फोटो और हस्ताक्षर बताए गए हैं। लेकिन महिलाओं में से एक का कहना है कि उन्हें हिंदी में लिखे दस्तावेज की जानकारी नहीं थी और अधिकारियों के कहने पर उन्होंने हस्ताक्षर कर दिए।

सुकमा पुनर्वास केंद्र में कार्यरत महिला पुलिसकर्मी सीमा पोयाम ने भी बताया कि महिलाओं को रायपुर ले जाने के लिए उन्हें ऊपर से आदेश मिला था। उनके अनुसार महिलाओं को केवल सिलाई से संबंधित प्रशिक्षण के लिए ले जाने की जानकारी दी गई थी और उन्हें भी रैंप वॉक के बारे में पहले से जानकारी नहीं थी।
पुनर्वास मॉडल पर भी उठे सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने पूर्व माओवादी महिलाओं के पुनर्वास और उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने के तरीके को लेकर बहस छेड़ दी है। सामाजिक कार्यकर्ता और वकील बेला भाटिया ने सवाल उठाते हुए कहा कि माओवादी पृष्ठभूमि से आने वाली आदिवासी महिलाओं को फैशन शो में इस तरह प्रस्तुत करना उनके वास्तविक सामाजिक और आर्थिक पुनर्वास का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
उनका कहना है कि इन महिलाओं के जीवन, उनके संघर्ष, अधिकारों और उन परिस्थितियों को समझना जरूरी है, जिनके कारण उन्होंने कभी हथियार उठाए थे। केवल रैंप पर कुछ मिनट चलने को सशक्तिकरण का प्रतीक बताना पर्याप्त नहीं है।
महिलाओं की अपनी इच्छा और भविष्य का सवाल
रैंप वॉक के बाद सामने आए बयानों में कुछ महिलाओं ने पुनर्वास केंद्र में अपनी जिंदगी को लेकर भी असहजता जताई। एक महिला ने कहा कि वह बचपन से जंगल और अपने गांव के माहौल में रहने की आदी रही है और अब पुनर्वास केंद्र में रहना उसे मुश्किल लगता है। उसने अपने गांव लौटकर खेती-किसानी करने की इच्छा जताई।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आत्मसमर्पण के बाद इन महिलाओं के लिए पुनर्वास का वास्तविक मॉडल क्या होना चाहिए—क्या उन्हें उनकी पसंद के रोजगार, कौशल प्रशिक्षण और अपने गांव लौटकर सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिलना चाहिए, या फिर ऐसे सार्वजनिक आयोजनों में उनकी भागीदारी को ही सशक्तिकरण का प्रतीक माना जाए?
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के इस कार्यक्रम ने एक ओर सरकार के पुनर्वास दावों को सामने रखा है, तो दूसरी ओर इसमें शामिल महिलाओं के बयानों ने उनकी सहमति, पारदर्शिता, पारिश्रमिक और पुनर्वास की वास्तविक स्थिति को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।