बसना

बसना: डामर उखड़ा, गड्ढे बढ़े…जमीन पर 20 साल पुरानी बदहाली पर पक्की सड़क

3.20 किमी सड़क से डामर गायब, बारिश में एंबुलेंस से विद्यार्थियों तक सबकी राह मुश्किल

देशराज दास बसना: विकास के दावों के बीच ग्राम पंचायत गुढ़ियारी के आश्रित ग्राम पीपलखूंटा की तस्वीर सरकारी व्यवस्था के सामने बड़ा सवाल खड़ा करती है। ब्लॉक मुख्यालय बसना से महज 10 किलोमीटर दूर करीब 600 से ज्यादा की आबादी वाला यह गांव आज भी ऐसी सड़क के लिए तरस रहा है, जो कभी पक्की हुआ करती थी।बरपेलाडीह से पीपलखूंटा को जोड़ने वाली 3.20 किलोमीटर सड़क का निर्माण लोक निर्माण विभाग ने वर्ष 2006 में कराया था। करीब दो दशक बाद सड़क से डामर का नामोनिशान तक मिट चुका है। जगह-जगह बड़े गड्ढे, उखड़ी गिट्टी और कीचड़ ने इसे सड़क कम और जोखिम भरा रास्ता ज्यादा बना दिया है।

बारिश आते ही सड़क बन जाती है दलदल

गर्मी में किसी तरह आवागमन हो जाता है, लेकिन बारिश शुरू होते ही ग्रामीणों की परेशानी कई गुना बढ़ जाती है। लगातार पानी और कीचड़ से सड़क दलदल में तब्दील हो जाती है। गड्ढों में पानी भरने के बाद यह पता लगाना भी मुश्किल होता है कि सड़क कहां है और गड्ढा कहां। दोपहिया वाहन फिसलते हैं, पैदल चलने वाले गिरते-पड़ते हैं और छोटे चारपहिया वाहनों का आवागमन कई जगह लगभग बंद हो जाता है।
यह समस्या केवल आवागमन तक सीमित नहीं है। बीमारी या प्रसव जैसी आपात स्थिति में यही सड़क ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ा संकट बन जाती है। ग्रामीणों के अनुसार बदहाल मार्ग के कारण कई बार 102 और 108 एंबुलेंस गांव तक पहुंचने में परेशानी होती है। ऐसे में मरीजों और गर्भवती महिलाओं को ट्रैक्टर अथवा दूसरे अस्थायी साधनों से अस्पताल तक ले जाना पड़ता है। बरसात के चार महीने ग्रामीणों के लिए हर साल इसी चिंता में गुजरते हैं कि जरूरत पड़ने पर अस्पताल कैसे पहुंचेंगे।

बच्चों की पढ़ाई भी सड़क की बदहाली की शिकार

पीपलखुंटा के विद्यार्थी माध्यमिक से लेकर उच्च शिक्षा के लिए बरपेलाडीह, भूकेल, बसना और सरायपाली जाते हैं। बारिश के दिनों में इन्हीं बच्चों को कीचड़ और फिसलन भरे रास्ते से होकर स्कूल-कॉलेज पहुंचना पड़ता है। कई बार कपड़े और किताबें कीचड़ से खराब होने के साथ दुर्घटना का खतरा भी बना रहता है। ग्रामीणों को गुढ़ियारी की सहकारी उचित मूल्य दुकान से राशन लाने में भी इसी रास्ते से होकर गुजरना पड़ता है।

20 साल में आश्वासन नहीं बदला, सड़क जरूर बदल गई

ग्रामीणों का कहना है कि सड़क के निर्माण और पुनर्निर्माण के लिए वर्षों से जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के सामने मांग रखी जा रही है। ज्ञापन दिए गए, आश्वासन मिले और प्रस्ताव भेजे जाने की बातें भी हुईं, लेकिन सड़क पर काम नहीं हुआ। चुनाव के समय पक्की सड़क का भरोसा मिलने की बात ग्रामीण बताते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही समस्या फिर वहीं लौट आती है।

महिलाओं में इसे लेकर विशेष नाराजगी है। उनका कहना है कि गांव की समस्याएं सुनने वाला कोई नहीं है। हमें केवल वोटर समझा जाता है, सुविधा देने के समय गांव को भुला दिया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क की बदहाली का असर केवल आवागमन पर नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक जीवन पर भी पड़ रहा है। खराब रास्ते के कारण रिश्तेदारी और विवाह संबंधों तक में परेशानी आने की बात ग्रामीण बताते हैं। सरपंच श्रीकांत पटेल, रोहित दास, अश्वनी दास, महेश, बृजलाल सहित दर्जनों ग्रामीणों ने सड़क के स्थायी पुनर्निर्माण की मांग की है। वहीं विद्यार्थी रजनी दास, सोना और मोना ने बताया कि बारिश में स्कूल जाना किसी चुनौती से कम नहीं होता।

विकास के दावों के बीच 3.20 किमी सड़क का सवाल

सरकार गांवों तक सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के दावे करती है, लेकिन यहां सवाल महज 3.20 किलोमीटर सड़क का है। 2006 में बनी सड़क करीब 20 साल बाद चलने लायक क्यों नहीं बची? हर बारिश में 600 ग्रामीणों का संपर्क संकट में क्यों पड़ता है? एंबुलेंस गांव तक पहुंचने में असमर्थ हो तो इसकी जवाबदेही किसकी है? ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द सड़क का स्थायी पुनर्निर्माण शुरू नहीं हुआ तो वे आंदोलन करने को मजबूर होंगे। अब देखना यह है कि हर साल बरसात में सामने आने वाली इस समस्या पर विभाग कागजी आश्वासन से आगे बढ़कर सड़क पर काम कब शुरू करता है।

सड़क की बदहाली और वर्षों से लंबित जीर्णोद्धार को लेकर लोक निर्माण विभाग के उप अभियंता एसके निषाद ने कहा कि सड़क के जीर्णोद्धार के लिए विभाग पिछले तीन-चार वर्षों से प्रस्ताव भेज रहा है। उन्होंने बताया कि फिलहाल वित्त विभाग की स्वीकृति मिलना शेष है। वित्तीय स्वीकृति प्राप्त होते ही सड़क के जीर्णोद्धार का कार्य शुरू कराया जाएगा।

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