बसना

बसना: क्रॉप कटिंग के आंकड़ों पर उठे सवाल, जांच के आदेश के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं? महीनों से फाइलों में दबा मामला

अगर रिकॉर्ड सही हैं तो जांच से स्थिति साफ होने में आखिर परेशानी क्या है? और यदि रिकॉर्ड में कोई गड़बड़ी नहीं है तो

देशराज दास बसना। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों को मिलने वाले मुआवजे का आधार बनने वाली क्रॉप कटिंग के आंकड़ों को लेकर बसना विकासखंड में उठे सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। आठ गांवों में खरीफ वर्ष 2025-26 के दौरान दर्ज धान उत्पादन के आंकड़ों में कथित गड़बड़ी को लेकर शिकायत के बाद कृषि विभाग ने जांच के निर्देश दिए थे, लेकिन कई सप्ताह बीत जाने के बाद भी जांच और कार्रवाई को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जांच आगे क्यों नहीं बढ़ रही?

मामला ग्राम भंवरपुर निवासी भोजराज प्रधान की शिकायत से जुड़ा है। शिकायतकर्ता ने दिसंबर 2025 में अनुविभागीय अधिकारी राजस्व बसना के समक्ष शिकायत करते हुए क्रॉप कटिंग के दौरान वास्तविक उत्पादन से अलग आंकड़े दर्ज किए जाने का आरोप लगाया था। शिकायत पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने के बाद मामला जन शिकायत पोर्टल तक पहुंचा।

इसके बाद 18 जून 2026 को उप संचालक कृषि कार्यालय महासमुंद की ओर से तहसीलदार बसना और वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी को सात दिवस के भीतर विस्तृत जांच कर प्रतिवेदन प्रस्तुत करने तथा दोषी पाए जाने पर कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे। लेकिन शिकायतकर्ता का कहना है कि निर्धारित समय बीतने के बाद भी न तो जांच रिपोर्ट सामने आई और न ही जिम्मेदारी तय की गई।

आंकड़ों में अंतर ने बढ़ाया संदेहशिकायत में बसना विकासखंड के भैंसाखुरी, पिताईपाली, बड़ेडाभा, सोनामुंदी, अंकोरी, रूपापाली, छिरार्चुवा और बसुलीडीह गांवों में दर्ज सिंचित एवं असिंचित धान की औसत उपज के आंकड़ों पर सवाल उठाए गए हैं।

इन आंकड़ों ने बढ़ाया संदेह- शिकायत में दर्ज फसल प्रयोग के अनुसार सिंचित धान की औसत उपज ग्राम भैंसाखुरी, पिताईपाली, बड़ेडाभा, सोनामुंदी, अंकोरी, रूपापाली, छिरार्चुवा और बसुलीडीह में क्रमशः 1165.164, 1935.987, 1527.464, 1946.840, 1620.000, 1733.400, 1334.880 एवं 1877.760 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है। वहीं असिंचित धान की औसत उपज क्रमशः 861.400, 1583.088, 1306.048, 882.808, 522.300, 1151.280, 803.160 एवं 969.441 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बताई गई है, जो जांच का विषय है।

शिकायतकर्ता का दावा है कि क्रॉप कटिंग में दर्ज उत्पादन और किसानों के वास्तविक उत्पादन में अंतर की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। इसके लिए क्रॉप कटिंग रिकॉर्ड के साथ संबंधित किसानों के रकबे, धान बिक्री और उपार्जन केंद्रों के रिकॉर्ड का मिलान कराया जाए तो वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।

एक ही क्षेत्र में बार-बार कम उपज का सवाल
शिकायत में कुछ पटवारियों के कार्यक्षेत्र में लगातार कम औसत उत्पादन दर्ज किए जाने का भी आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ता ने मांग की है कि केवल वर्तमान वर्ष ही नहीं, बल्कि संबंधित क्षेत्रों के पिछले वर्षों के क्रॉप कटिंग रिकॉर्ड, फसल बीमा भुगतान और धान खरीदी के आंकड़ों का भी मिलान कराया जाए।

यही वह बिंदु है जिस पर अब सवाल और गंभीर हो जाता है—अगर रिकॉर्ड सही हैं तो जांच से स्थिति साफ होने में आखिर परेशानी क्या है? और यदि रिकॉर्ड में कोई गड़बड़ी नहीं है तो संबंधित विभाग विस्तृत जांच कर रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं कर रहा?

जांच के आदेश के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं?
कृषि विभाग द्वारा सात दिवस के भीतर जांच प्रतिवेदन मांगे जाने के बावजूद अब तक जांच पूरी नहीं होने से शिकायतकर्ता और किसानों के बीच सवाल उठ रहे हैं। क्या विभागीय स्तर पर जांच प्रक्रिया में लापरवाही हो रही है? क्या राजस्व और कृषि विभाग के बीच समन्वय की कमी के कारण मामला लंबित है? या फिर किसी स्तर पर जिम्मेदारी तय करने से अधिकारी बच रहे हैं?

यह भी जांच का विषय है कि यदि क्रॉप कटिंग के आंकड़ों में वास्तव में अनियमितता हुई है तो इसका सीधा असर किसानों के फसल बीमा दावों पर पड़ा होगा या नहीं।

अधिकारियों के अपने-अपने तर्क
कृषि उप संचालक महासमुंद एफआर कश्यप ने बताया कि पीजी पोर्टल के माध्यम से शिकायत प्राप्त हुई है। मामले की जांच एवं आवश्यक कार्रवाई के लिए कृषि विभाग और तहसील कार्यालय को निर्देशित किया गया है।

वरिष्ठ कृषि विस्तार अधिकारी बसना यूके खेस ने बताया कि कृषि उप संचालक कार्यालय से जांच के संबंध में पत्र प्राप्त हुआ है। मामले से जुड़े कई रिकॉर्ड राजस्व विभाग के पास होने के कारण तहसीलदार बसना को जांच के लिए पत्र लिखा गया है।

वहीं तहसीलदार बसना नितिन ठाकुर ने कहा कि क्रॉप कटिंग के दौरान दर्ज मूल खसरा रकबे में वर्तमान में परिवर्तन हो चुका है और वहां नई फसल लगाई जा चुकी है, इसलिए पूर्व की फसल का मौके पर भौतिक सत्यापन संभव नहीं है। हालांकि उपलब्ध राजस्व एवं अन्य रिकॉर्ड के आधार पर संबंधित किसान ने उस रकबे से कितना धान बेचा था, इसकी जांच की जा सकती है। उन्होंने मामले की जांच कराने की बात कही है।

अब निगाह जांच रिपोर्ट पर
क्रॉप कटिंग के आंकड़ों पर उठे सवालों का जवाब सिर्फ बयान से नहीं, बल्कि रिकॉर्ड के मिलान से सामने आ सकता है। संबंधित गांवों के क्रॉप कटिंग रिकॉर्ड, राजस्व रिकॉर्ड, किसानों के रकबे और धान खरीदी के आंकड़ों का मिलान हो तो स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है।

अब देखना यह है कि महीनों से लंबित इस मामले में विभाग वास्तव में जांच पूरी कर जिम्मेदारी तय करता है या फिर यह शिकायत भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाती है। सबसे बड़ा सवाल यही है—जब जांच के स्पष्ट निर्देश दिए गए थे, तो अब तक जांच रिपोर्ट कहां है?

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