सरायपाली

सरायपाली,बसना: ढाबों में अवैध शराब का खेल: जब्ती तक सिमटी कार्रवाई,असली सप्लायर और संचालकों पर कब गिरेगा बुलडोजर?

सरायपाली,बसना,सारंगढ़ रोड के ढाबों में अवैध शराब का नेटवर्क? कर्मचारियों पर कार्रवाई से उठे सवाल, असली संचालकों तक कब पहुंचेगा कानून

सरायपाली,बसना। सारंगढ़ रोड व आसपास के ढाबों में लगातार दूसरी राज्य की अवैध शराब पकड़े जाने के बाद स्थानीय लोगों में इस बात की जमकर चर्चा हैं कि सिर्फ शराब जब्ती कर पर्चा दर्ज करने की परंपरा कब तक निर्वहन की जाएगी। लोगों का स्पष्ट कहना है, ऐसे अवैध ढाबों पर बुलडोजर चलना चाहिए और व्यवस्थित तस्करी के नेटवर्क को जड़ से उखाड़ फेंका जाना चाहिए।

कुछ दिनों पहले आबकारी विभाग की कार्रवाई में 12 अगस्त को ग्राम नवागढ़ स्थित समीर द ढाबा से कुल 8.46 लीटर के साथ संजय पिता छबिराम साहू की गिरफ्तारी और 14 अगस्त को ग्राम बोन्दा स्थित अपना ढाबा से 6.48 लीटर अवैध रूप से बिक्री के लिए रखी शराब बरामद कर हरिराम पिता बिसिकेशन पटेल को गिरफ्तार किया गया हैं। वही 15 अगस्त को नयागांव बलौदा में लगभग 13 लीटर महूवा शराब के साथ नरेश नन्द पिता जीवर्धन को आबकारी विभाग के स्थानीय अधिकारियों ने तीनो घटनाओं में धाराएं 34(1)(क), 34(2) और 59(क) के तहत प्रकरण दर्ज किया हैं।

मगर कार्रवाई में चिंता की एक बड़ी वजह यह रही कि अक्सर ढाबा संचालकों के बजाय कर्मचारियों के नाम प्रकरण दर्ज किए जा रहे हैं। स्थानीय लोग व कानूनी विशेषज्ञ इसे नौटंकियों जैसा करार दे रहे हैं और पूछ रहे हैं कि क्या कर्मचारियों पर मामला दर्ज कर सिस्टम मुश्किलों से निजात पा रहा है या यह जानबूझकर गंभीर आरोपियों तक पहुंचने से बचाव है?

ठोस सवाल यह भी उठता है कि यदि ढाबा किराये पर चल रहा है तो मालिक के खिलाफ कौन सी कार्रवाई की जा रही है? स्थानीय लोगों का कहना है कि किराये पर चल रहे ढाबों के असली मालिकों पर ठोस, त्वरित और सार्वजनिक कार्रवाई जरूरी है, नहीं तो ये ढाबे बस हथकंडों के सहारे जारी रहेंगे। वहीं यदि ये ढाबे शासकीय जमीन पर संचालित हैं तो उन्हें खाली कराना स्थानीय प्रशासन, राजस्व विभाग या आबकारी विभाग किसके जिम्मे हैं यह सवाल बना हुआ है।

सबसे बड़ा विवाद पुलिस और आबकारी विभाग की निष्क्रियता को लेकर है। ढाबों में खपाई जा रही शराब की आवक का स्रोत स्पष्ट है, पर सप्लाई चैन को काटने में पुलिस और आबकारी विभाग अब तक विफल रहे हैं। स्थानीय सक्रिय नागरिक समूहों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि विभाग केवल निचले पड़ाव पर कार्रवाई कर रहे हैं, जबकि असली आपूर्तिकर्ता और नेटवर्क तक पहुंचना उनकी प्राथमिकता नहीं बन रहा। क्या विभाग जानबूझकर आपूर्ति के स्रोतों को नहीं तोड़ रहा, या उनके पास पर्याप्त राजनीतिक और प्रशासनिक समर्थन नहीं? यही बड़ा और गंभीर सवाल है।

कांग्रेस नेता जफर उल्ला खान
ने कहा कि सिर्फ जब्ती के आंकड़ों से काम नहीं चलेगा। उन्होंने कहा कि प्रदेश के मुखिया के पास आबकारी विभाग हैं ऐसे में इन ढाबों पर बुलडोजर कार्रवाई हो और अवैध शराब के अड्डों को तत्काल ढहाया जाए। ऐसे ढाबों के खाद्य लाइसेंस को समाप्त कब किया जाएगा ? साथ ही ढाबा संचालकों के बजाय बार-बार कर्मचारियों के नाम पर प्रकरण दर्ज करने की प्रथा की न्यायिक जाँच हो। किराए व स्वामित्व संबंधी रिकॉर्ड की जांच कर वास्तविक मालिकों पर आपराधिक व सिविल कार्रवाई की जाए।

शासकीय जमीन पर चल रहे ढाबों को खाली करवाने के लिए जिम्मेदार विभाग और अधिकारियों की सूची सार्वजनिक की जाए। पुलिस और आबकारी विभाग आपूर्ति स्रोतों, सप्लायर नेटवर्क और परिवहन मार्गों की तुरंत और प्रभावी छानबीन करें। अगर शह मिल रही है तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भी सख्त कदम उठाए जाने पर ही मुख्यमंत्री के पास इस विभाग की कार्रवाई को उचित करार दिया जा सकता हैं।

आबकारी विभाग ने फिलहाल केवल जब्ती और प्रकरण दर्ज करने की बात दोहराई है, पर स्थानीय प्रशासन और सामाजिक जन इसे अपर्याप्त मान रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में ऐसी गतिविधियों की दीर्घकालीन उपस्थिति पर सवाल उठे हैं क्या सूचना तंत्र फेल रहा, या जानबूझकर अनदेखी की जा रही है? अगर जवाब नहीं मिला तो जनता की सहनशक्ति कम पड़ सकती है और दबाव और तेज़ होने की संभावना है।

अधिकारियों का कहना है कि आगे की कार्रवाई संदिग्धों की पहचान और नेटवर्क के खुलासे पर निर्भर करेगी। वहीं संबंधित गांव के ग्रामीणों ने कड़ाई से कानून लागू करने की स्पष्ट मांग करते हुए बुलडोजर कार्रवाई, असली दोषियों पर मुकदमे और आपूर्ति चैन को तोड़ने अन्यथा साख और सुरक्षा के लिए बना सुशासन का दावा सिर्फ वक्त की बात बनकर रह जाने की बात कही हैं।

उक्त कार्रवाई में सुश्री आरती साहू आबकारी उपनिरीक्षक, शिव शंकर नेताम आबकारी उपनिरीक्षक एवं मिर्जा जफर बेग आबकारी उपनिरीक्षक आबकारी आरक्षक सविता भगत, टीकाराम पटेल सरायपाली एवं बसना स्टाफ रहे.

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