महासमुंद

महासमुंद: जातिगत भेदभाव मिटाकर संगठित हिंदू समाज का संकल्प,सामाजिक समरसता यात्रा का रायपुर में समापन

सिंघोड़ा से रायपुर तक सात दिवसीय समरसता यात्रा का समापन

छत्तीसगढ़ भूमि न्यूज़ महासमुंद। जाति, ऊंच-नीच और छुआछूत के भेदभाव से मुक्त समरस समाज का निर्माण ही सामाजिक एकता की आधारशिला है। इसी भाव को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से विश्व हिंदू परिषद छत्तीसगढ़ द्वारा निकाली गई।सात दिवसीय सामाजिक समरसता यात्रा का 28 अक्टूबर को रायपुर के पहाड़ीपारा गुढ़ियारी स्थित श्रीराम जानकी मंदिर में समापन हुआ। 22 अक्टूबर को महासमुंद जिले के सिंघोड़ा स्थित मां रुद्रेश्वरी मंदिर से पूज्य संतों के सानिध्य में प्रारंभ हुई इस यात्रा ने विभिन्न गांवों में सामाजिक एकात्मता, सांस्कृतिक चेतना और हिंदू समाज की एकजुटता का संदेश दिया।

रंगोली, कलश और दीपों से सजे गांव
समरसता यात्रा गांव-गांव पहुंचने पर गांवो में उत्सव जैसा वातावरण दिखाई दिया। घरों के सामने रंगोली बनाई गई, कलश स्थापित किए गए और दीप प्रज्वलित कर संतों का अभिनंदन किया गया। महिलाओं ने घर-घर साधु-संतों, पदयात्रियों और समरसता रथ की आरती उतारकर श्रीफल अर्पित किया तथा आशीर्वाद प्राप्त किया। भजन-कीर्तन और जय श्रीराम के जयघोष से पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो उठा। ग्रामीणों ने संतों का शाल और श्रीफल भेंटकर सम्मान किया। नौ कन्या पूजन के माध्यम से भारतीय परंपरा, संस्कार और नारी सम्मान का संदेश दिया गया। इस आयोजन की विशेषता विभिन्न जातियों और समाजों के लोगों की सहभागिता रही। ग्रामीणों ने आपसी भेदभाव से ऊपर उठकर एक मंच पर सहभागिता निभाई। यात्रा ने यह संदेश दिया कि सामाजिक एकता केवल विचारों तक सीमित न रहे, बल्कि व्यवहार, पारस्परिक संबंधों और दैनिक जीवन में भी दिखाई दे।

समरसता का आधार परस्पर सम्मान और आत्मीयता
यात्रा में पूज्य संत वसुदास निखिल, संत ओंकार दास, संत योगेश गिरी, संत विनोद गिरी, संत हनुनन्द, संत सैनिक दास, संत रामेश्वर दास, कृष्णावन्दे, संत सीताराम दास, महंत राधामोहन दास, चंद्रिका दास, संत राधेश्याम, सर्वेश्वर दास, संत कृष्ण दास, संत भानु साहेब और संत माधव दास त्यागी सहित अनेक संतों का सानिध्य रहा। संतों के मार्गदर्शन में समाज को जातिगत भेदभाव, छुआछूत और ऊंच-नीच की मानसिकता से मुक्त करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। समरस समाज का भाव तभी मजबूत होगा, जब प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान मिले और समाज के सभी वर्ग परस्पर आत्मीयता के साथ आगे बढ़ें। भारतीय संस्कृति की सेवा, सद्भाव, करुणा और मानवता की परंपराओं को व्यवहार में उतारने का आह्वान किया गया।

पंच परिवर्तन से समाज जागरण का संदेश
यात्रा के माध्यम से पंच परिवर्तन के पांच प्रमुख आयामों- सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी और नागरिक कर्तव्यों- के प्रति जनजागरण का संदेश दिया गया। इन विषयों के जरिए परिवारों में संस्कार, समाज में परस्पर सहयोग, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, स्वदेशी के प्रति आग्रह और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध को मजबूत करने पर जोर रहा।

सात दिनों में अनेक गांवों तक पहुंचा अभियान
22 अक्टूबर को सिंघोड़ा स्थित मां रुद्रेश्वरी मंदिर से प्रारंभ हुई यात्रा छुईपाली होते हुए मल्दामाल पहुंची। 23 अक्टूबर को गेर्रा से बालोदा, कुशमीशरार और बालसी, 24 अक्टूबर को गुढ़ियारी से पिलुवापाली, कपसाखुटा और बड़ेड़ाभा, जबकि 25 अक्टूबर को सावित्रीपुर, माटीदरहा और बीजेपुर होते हुए गड़बेड़ा पहुंची। 26 अक्टूबर को झलप से छिंदोली, तोरला, जोगीडीपा (पटेवा) और तुमगांव होते हुए यात्रा आगे बढ़ी। 27 अक्टूबर को समोदा से केशला, खरोरा, मोहरेंगा, चिचोली, खम्हारिया, बंजारी धाम मढ़ी, खौना और दोनदेकला होते हुए यात्रा रायपुर पहुंची। 28 अक्टूबर को दोपहर 12 बजे गुढ़ियारी के श्रीराम-जानकी मंदिर में यात्रा का समापन हुआ।

 

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