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“बदलते दौर में रिश्तों और संस्कारों पर करारा व्यंग्य, ‘आज के आदमी के टाइम फेल होगे’ कविता बनी चर्चा का विषय: स्वरचित – भवानीशंकर पण्डा

आज के आदमी के टाइम फेल होगे,स्वरचित – भवानीशंकर पण्डा

ना जाने का के खेल होगे,आज के आदमी के टाइम फेल होगे।

आधुनिक जीवनशैली और तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश के बीच मानवीय रिश्तों, संस्कारों और जीवन मूल्यों पर आधारित रचना “आज के आदमी के टाइम फेल होगे” इन दिनों लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही है। इस रचना में लेखक ने सरल और स्थानीय भाषा का प्रयोग करते हुए समाज में आ रहे बदलावों को व्यंग्यात्मक अंदाज में भवानीशंकर पण्डा ने प्रस्तुत किया है।

कविता में बच्चों के बदलते खेल, परिवारों में बढ़ती दूरियां, बुजुर्गों की उपेक्षा, खेती-किसानी में आ रहे बदलाव, मोबाइल की बढ़ती लत तथा सामाजिक जीवन में घटते संस्कारों का उल्लेख किया गया है। लेखक ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि यदि समय रहते समाज ने अपनी परंपराओं और मानवीय मूल्यों को नहीं संभाला, तो आने वाली पीढ़ियां इन बदलावों का गंभीर परिणाम भुगतेंगी।

01.

बालपन के टाइम पास रहिस,
लट्टूनी, गिल्ली-डंडा खेल,
पिचकारी सबके संग मं बिते,
सब झिन रहैं एक अड्डा भर।
दिन, हफ्ता, महीना भर मं डारियाँ के खत पहुँचे,
अब खत आज एक सेकंड मं सेल होगे।
आज के आदमी के टाइम फेल होगे…

02.

नहाय के समय, साबुन के जगह माटी राख घुरिस,
कपड़ा, चप्पल, शरीर ला मं हर सफा एकसार ले।
ज्यादा माटी राखव ना साफ करिस,
आज न जाने आदमी के शरीर मं
अनेक जंजाल मेल होगे।
आज के आदमी के टाइम फेल होगे…

03.

पहिले झूठ ला झूठ जाने,
जाने सच ला सच।
एक-दूसर के सहयोग मं
जिंदगी रहै साफ अउ स्वच्छ।
अबे ले देश बचाय बर,
न जाने कतको ला जेल होगे।
आज के आदमी के टाइम फेल होगे…

04.

बेटी के बिहाव मं आवते बराती,
लागे दिन या हफ्ता भर।
बैलगाड़ी त दूर रे पगडंडी,
पांवकी तल नहीं रहिस ककरो घर।
आज तो दूर शहर गाँव मं रेल होगे।
आज के आदमी के टाइम फेल होगे…

05.

बेटी के बाप – बेटा देखे,
बेटा के बाप – रे बेटी।
का करत हस? पूछें बाप हें,
नौकरी या किसानी-खेती।
पर आज तो दोनों झिन के
मोबाइल मं खेल होगे।
आज के आदमी के टाइम फेल होगे…

06.

पहिले किसान ह फसल लगावें,
उड़द अउ मूंगफली के।
तब तिहार जैसे रहैं,
हर गाँव, हर गली के।
पर आज महंगा डीजल, पेट्रोल अउ
खाय के तेल होगे।
आज के आदमी के टाइम फेल होगे…

07.

आज टाइम मं बड़े कसरत कर,
जल्दी हफ्ता के काम मिनट मं होवत हे।
फिर भी तनाव, चिंता अउ फिकर मं,
आदमी खुद घेर के रोवत हे।
जिंदगी ह चिंता-फिकर के खेल होगे।
आज के आदमी के टाइम फेल होगे…

08.

जीवन हे झुंड मं बोझा ले के,
आदमी ह अपन काम कर।
तनाव उसक बोझा, पिछा नई छोड़त हे,
जब आवत हे घर आराम बर।
आदमी अब आदमी नहीं रहिगे,
गदहा जइसन बेल होगे।
आज के आदमी के टाइम फेल होगे…

09.

सुन्दर-शांत गाँव छोड़ के,
भीड़-भाड़ वाला शहर जात हे।
संगी-साथी, रिश्ता-नाता छोड़,
दूसर के गोठ ह बड़ा सुहात हे।
एक दिन अइसन आही कि
गाँव लौटना पड़ जाही,
तब चलही पता कि इही गाँव मं
तीर जम्मो काम बन जाही।
आज संगी-साथी, रिश्ता-नाता के,
खतमे ह खेल होगे।
आज के आदमी के टाइम फेल होगे…

10.

लईका मन के जलपान मं रहैं,
पनपक्का, पेज, बासी अउ टमाटर के चटनी।
पिये बर मिले मटकी के पानी, दूध, दही के मठानी।
पर आज के नाश्ता –
इडली, पूरी अउ मैदा होगे।
आज के आदमी के टाइम…

11.

पुराना कहावत हे कि –
बबूल फूल मं बबूल होथे,
आम फूल मं आम होथे।
पर कलियुग आघात ले मयारू,
किरे कलियुग मं कुछ भी हो सकथे।
तभी तो बर एक मं दाल, बेल होगे।
आज के आदमी के टाइम फेल होगे…

— भवानीशंकर पण्डा

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