
बसना. बिना पंचांग देखे जिस मुहूर्त में सभी तरह के संस्कार संपन्न किए जा सकते हैं, उसे अक्षय तृतीया कहा जाता है। इस महामुहूर्त को छत्तीसगढ़ में ‘अक्ती’ के रूप में जाना जाता है।

वही महासमुंद जिले के बसना क्षेत्र में अक्षय तृतीया के दिन मिट्टी के पुतरा-पुतरी (पुतला-पुतली) का विवाह कराने की परंपरा है। नगर के टिकरापारा निवासी हिमालय सिन्हा व पारुल डड़सेना ने अपने घरों में छोटे-छोटे बच्चों के साथ सदियों से चली आ रही पुतरा पुतरी की शादी कराई, जिसमें बरात ले जाने से लेकर पांव पूजन, टिकावन के साथ विदाई भी कराई गई. इस अनोखे शादी में परिवार समेत बड़े बुजुर्गो शामिल हुए.

नगर के प्रकाश सिन्हा ने बताया सदियों से चली आ रही पुरानी परंपराओं के साथ अक्षय तृतीया पर बसना में भी लोगों ने गुड्डा गुड़िया की मंडप बनाकर पूरे विधि विधान से शादी कराई. छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में रचे-बसे पुतरा-पुतरी के विवाह का विशेष महत्व है। लेकिन बदलते समय और दौर के हिसाब से अब ये आधुनिकता की परिभाषा में गुड्डे-गुड़ियों की शादी के नाम से मशहूर हो गया है l
वार्ड के जसवंत डड़सेना अपनी पुरानी यादो को ताज़ा करते हुए बताते है कि उनके समय में भी पुतरा-पुतरी के विवाह का विशेष महत्व रहा करता था। इस दिन बकायदा लकड़ी के पाटे को चारों तरफ से सजाकर पुतरा-पुतरी का विवाह पुरे विधि-विधान से संपन्न किया जाता था, लेकिन बदलते समय के परिवेश में इसमें विशेषकर शहरी क्षेत्रों में लगातार परिवर्तन देखने को मिल रहा है.
ग्रामीण अंचल के लोग बताते है कि पुराने जमाने में बांस और मिट्टी से निर्मित पुतरा-पुतरी का चलन था। हालांकि कहीं कहीं अब भी यह देखने को मिल जाता है, लेकिन आधुनिकता इस पर भी हावी हो गई है. बच्चे अब आधुनिक परिधान में सजे गुड्डे-गुड़ियों की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं l
गुड्डे-गुड़ियों की शादी रचा कर बच्चे हुए खुश
नगर के अनेक स्थानों पर पुतरा-पुतरी विवाह हुआ लेकिन टिकरापारा वार्ड में अक्षय तृतीया के दिन विधि-विधान से गुड्डे-गुड़ियों का विवाह कर खुशियां बटोरे. उक्त विवाह में ओमेश, दुर्गेश, दीपक, मनोज, अनिल, अरुण, सुमित, सुनील, तरुण, अखिल, ओम, प्रांजल, भीम, युनिता, प्राची, अनय, मान्या, आशी, काव्या, दिशा, मीनाक्षी, मोनिका, नीनी, समेत वार्ड के बच्चे शामिल रहे.