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बसना ने वीरों को किया अमर, कारगिल विजय दिवस पर शहीद स्मारक होगा राष्ट्र को समर्पित

1971 के अमर शहीद योगेश्वर दास और मेजर डॉ. गगनदीप सिंह भाटिया की गौरवगाथा अब नई पीढ़ी को देगी राष्ट्रभक्ति, शौर्य और सर्वोच्च बलिदान की प्रेरणा

देशराज दास बसना। कारगिल विजय दिवस पर बसना अपनी वीर परंपरा को इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज करने जा रहा है। आज 26 जुलाई को शहीद स्मारक निर्माण समिति, पूर्व सैनिक संघ फुलझर अंचल एवं बसना अंचलवासियों के सहयोग से नगर में निर्मित शहीद स्मारक का लोकार्पण होगा, जहां मातृभूमि की रक्षा में सर्वस्व न्यौछावर करने वाले वीर सपूतों की अमर गाथा सदैव जीवंत रहेगी।

यह स्मारक केवल पत्थरों की संरचना नहीं, बल्कि त्याग, शौर्य, राष्ट्रभक्ति और कर्तव्यनिष्ठा का प्रेरणास्थल होगा, जो हर पीढ़ी को यह एहसास कराएगा कि आज का सुरक्षित भारत वीर सैनिकों के रक्त और बलिदान की नींव पर खड़ा है।

1971 के भारत-पाक युद्ध के अमर शहीद सिपाही योगेश्वर दास तथा भारतीय सेना के मेजर डॉ. गगनदीप सिंह भाटिया जैसे वीर सपूतों ने बसना की इस पावन धरती को राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बना दिया है।

1971 के भारत-पाक युद्ध का अमर नायक- शहीद योगेश्वर दास की वीरगाथा

कुछ नाम इतिहास की किताबों में लिखे जाते हैं, और कुछ शहीद अपने रक्त से इतिहास रच जाते हैं,,,,,,ऐसे ही बसना विकासखंड के ग्राम बरतियाभांठा में जन्मे शहीद सिपाही योगेश्वर दास ऐसे ही अमर वीरों में शामिल हैं, जिन्होंने 1971 के भारत-पाक युद्ध में मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया और हमेशा के लिए अमर हो गए। रामचंद्र दास और जलमती दास के घर जन्मे योगेश्वर दास ने बचपन से ही राष्ट्रसेवा का सपना संजोया। उन्होंने 20 मई 1963 को भारतीय थल सेना की इलेक्ट्रॉनिक्स एवं मैकेनिकल इंजीनियर्स कोर में भर्ती होकर देशसेवा का संकल्प लिया। 404 इन्फैंट्री ट्रूप्स वर्कशॉप में सेवाएं देते हुए उन्होंने युद्धभूमि में सेना के टैंक, तोप, सैन्य वाहन और हथियारों को हर परिस्थिति में संचालन योग्य बनाए रखने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। 20 नवंबर 1971 को भारत-पाक युद्ध के दौरान सीमाओं पर संघर्ष के बीच उन्होंने मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया।

वे उन अमर वीरों में शामिल हैं, जिनके त्याग और समर्पण ने भारत की विजय की नींव को मजबूत किया। शहीद योगेश्वर दास का नाम भारतीय सैन्य इतिहास में साहस, कर्तव्य और राष्ट्रभक्ति की अमिट गाथा के रूप में सदैव अमर रहेगा।

वीर सपूत की विरासत धुंधली, नई पीढ़ी अब भी अनजान

सबसे बड़ा सवाल यह है कि 1971 के भारत-पाक युद्ध के इस अमर शहीद की जन्मभूमि ग्राम बरतियाभांठा में आज उनकी स्मृति का कोई स्थायी चिन्ह नहीं है। न उनके नाम पर स्मारक है, न प्रतिमा, न विद्यालय, न सड़क। हैरानी की बात यह है कि गांव के कई युवा और ग्रामीण भी शहीद योगेश्वर दास के नाम और उनके बलिदान से अनजान हैं।

कारगिल विजय दिवस और स्वतंत्रता दिवस तभी सार्थक होंगे, जब हम अपने क्षेत्र के वीर सपूतों को भी सम्मानपूर्वक याद रखें। शासन और समाज को चाहिए कि शहीद योगेश्वर दास का स्मारक स्थापित किया जाए तथा किसी विद्यालय, सड़क या सार्वजनिक संस्थान का नाम उनके नाम पर रखा जाए। यही उस अमर वीर के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी, जिसने मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।

सेवा, समर्पण और सैन्य सम्मान की अमर गाथा- मेजर डॉ. गगनदीप सिंह भाटिया

बसना की वीरभूमि की गौरवगाथा यहीं समाप्त नहीं होती। इसी मिट्टी ने भारतीय सेना के मेजर डॉ. गगनदीप सिंह भाटिया जैसे समर्पित सैन्य चिकित्सक को भी देश को समर्पित किया। 16 मार्च 1990 को बसना के प्रतिष्ठित चिकित्सक डॉ. नगेंद्र सिंह भाटिया एवं पूनम कौर के घर जन्मे गगनदीप ने बचपन से ही सेवा को अपना लक्ष्य बनाया। एमबीबीएस के बाद वे भारतीय थल सेना के आर्मी मेडिकल कोर में अधिकारी बने। उन्होंने जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, जैसलमेर और दिल्ली सहित देश के अनेक संवेदनशील क्षेत्रों में सेवाएं दीं।

कोरोना महामारी के कठिन दौर में भी उन्होंने सैन्य अस्पताल में मरीजों की निस्वार्थ सेवा कर अपने कर्तव्य का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया। बाद में वे असम राइफल्स के अंतर्गत मेजर के पद पर झारखंड के नामकुम मिलिट्री हॉस्पिटल में पदस्थ रहे। 17 जनवरी 2023 को ड्यूटी पर लौटते समय झारखंड में एक सड़क दुर्घटना में उनका असामयिक निधन हो गया। तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर जब बसना पहुंचा तो पूरा नगर अपने वीर सपूत को अंतिम सलाम देने उमड़ पड़ा। भारत माता के जयघोष, पुष्पवर्षा और नम आंखों के बीच सेना ने पूरे सैन्य सम्मान के साथ गार्ड ऑफ ऑनर दिया तथा राष्ट्रीय ध्वज उनके पिता को सौंपा। वह मार्मिक क्षण आज भी बसना की सामूहिक स्मृतियों में अमिट है।

शहीद स्मारक बनेगा राष्ट्रभक्ति का प्रेरणा-स्थल, वीरों की गाथा रहेगी अमर

अब बसना का यह शहीद स्मारक इन अमर बलिदानों का साक्षी बनेगा। यह केवल श्रद्धांजलि का स्थान नहीं होगा, बल्कि हर उस बच्चे और युवा के लिए प्रेरणास्थल होगा, जो यहां आकर सीखेगा कि राष्ट्र सर्वोपरि होता है और मातृभूमि के लिए दिया गया बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता।

आज 26 जुलाई को जब इस स्मारक का लोकार्पण होगा, तब केवल एक स्मारक का उद्घाटन नहीं होगा, बल्कि बसना अपने वीर सपूतों के प्रति कृतज्ञता, सम्मान और राष्ट्रभक्ति का सार्वजनिक प्रण दोहराएगा। यह स्मारक आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा कि देश के लिए जीना गौरव है और देश के लिए मरना अमरत्व।

 

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